चली आती है अब तो हर कहीं बाज़ार की राखी
सुनहरी सब्ज़ रेशम ज़र्द और गुलनार की राखी
बनी है गो कि नादिर ख़ूब हर सरदार की राखी
सलोनों में अजब रंगीं है उस दिलदार की राखी
न पहुँचे एक गुल को यार जिस गुलज़ार की राखी
अया है अब तो राखी भी, चमन भी, गुल भी शबनम भी
झलक जाता है मोती और झलक जाता है रेशम भी
तमाशा है अहाहाहा! ग़नीमत है यह आलम भी
उठाना हाथ प्यारे वाह वा टुक देख लें हम भी
तुम्हारी मोतियों की और ज़री के तार की राखी
अदा से हाथ उठते हैं गुले राखी जो हिलते हैं
कलेजे देखने वालों के क्या क्या आह! छिलते हैं
कहाँ नाज़ुक यह पहुँचे और कहाँ यह रंग मिलते हैं
चमन में शाख पर कब इस तरह के फूल खिलते हैं
जो कुछ ख़ूबी में है उस शोखे गुलरुख़सार की राखी
फिरे हैं राखियाँ बाँधे जो हर दम हुस्न के तारे
तो उन की राखियों को देख अय जां चाव के मारे
पहन ज़ुन्नार और कश्का लगा माथे उपर बारे
'नज़ीर' आया है बाह्मन बन के राखी बाँधने प्यारे
बँधा लो उससे तुम हँस कर अब इस त्यौहार की राखी
- नज़ीर अकबराबादी
[हिन्दोस्तां हमारा, संपादन - जाँ निसार अख्तर]